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रेलवे ने सीसीटीवी कैमरे के किराये के तौर पर दिए करोडो रुपये

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पश्चिम रेलवे ने बिना टेंडर का दिया सीसीटीवी का ठेका

रेलवे के पास कंपनी की नही जानकारी

नागमणि पाण्डेय

मुंबई: आतंकियों द्वारा रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों के निशाना बनाये जाने के बाद स्टेशनों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है  लेकिन मध्य और पश्चिम रेलवे ने सुरक्षा के नाम  करोड़ों का राजस्व लुटाने पर लगा है।पिछले पांच वर्षो में  सिर्फ सीसीटीवी कैमरे का किराये के तौर पर 25 करोड़ 89 लाख रुपये से अधिक दिया जा चुका है | विशेष की पश्चिम रेलवे तो बिना टेंडर के सीसीटीवी कैमरे का काम देकर रेलवे का राजस्व लुटा रही है |

सूचना के अधिकार अंतर्गत अनीस खान ने एक जानकारी मांगी थी मध्य और पश्चिम रेलवे द्वारा जानकारी मांगी गयी थी | जिसके जवाब मध्य रेलवे ने बताया है की मुंबई मंडल के लिए सुरक्षा प्रणाली पर खर्च करने के लिए 28 लाख 29 हजार 17 हजार रुपये की मंजूरी मिला है | जिसमे से अभी तक 19 करोड़ 85 लाख 26 हजार रुपये खर्च किया जा चुका है | इस में बताया गया है की मध्य रेलवे के स्टेशनों पर सीसीटीवी कैमरा लगाने के लिए 29 नवंबर 2010 में टेंडर निकाला गया था | इस में कुल 784 सीसीटीवी कैमरे लगाना था |सीसीटीवी कैमरों के बारे में मांगी गई जानकारी के जवाब में मध्य रेलवे ने कैमरों का पूरा विवरण देते हुए कहा है कि यह किस कंपनी से खरीदे गए हैं, इसकी जानकरी उनके कार्यालय को नहीं है। मध्य रेलवे ने सुरक्षा कारणों से सीसीटीवी कैमरों के नियत स्थानों की जानकारी देने से मना कर दिया है। मध्य रेलवे ने कहा है कि इस योजना के तहत कुल 784 सीसीटीवी कैमरे खरीदे गए हैं, जिनमें से 403 कैमरे लगाए जा चुके हैं, जबकि 381 कैमरे अभी लगाए जाने बाकी हैं। मध्य रेल ने 8 व्हीकल स्कैनर खरीदे थे, मगर यह आज तक कहीं भी स्थापित नहीं किए जा सके हैं, ऎसा क्यों हुआ, इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई है। इस के साथ ही अन्य सुरक्षा से संबंधित कार्यो पर 19 करोड़ 85 लाख 26 हजार रुपये  खर्च किया जा चुका है | वही पश्चिम रेलवे ने सिर्फ 550 कैमरे के लिए  वर्ष २००९ से अभी तक कुल 5 करोड़ 23 लाख 68 हजार 180 रुपये किराया दिया चुका है | वहीं पश्चिम रेलवे ने यह कहकर जानकारी देने से इनकार दिया कि इंटीग्रेटेड (अत्याधुनिक) सुरक्षा व्यवस्था की लागत की कोई जानकरी उनके कार्यालय  में उपलब्ध ही नहीं है। जानकारी में बताया गया है की  मध्य रेलवे द्वारा 11 हैवी ड्यूटी एक्सरे बैगेज स्कैनर और 2 पोर्ट एक्सरे बैगेज स्कैनर मंगाकर लगाए जा चुके हैं। इसी प्रकार मध्य रेलवे द्वारा 85 डीएफएम/डी लगाए गए हैं और 426 एचएच एमडी (हैंड हेल्ड मेटल डिटेक्टर) संबंधित स्टाफ को सौंपे जा चुके हैं, मगर मंगाए गए एक-एक इलेक्ट्रॉनिक वैपर डिटेक्टर और ए क्सप्लोसिव डिस्पोजल औजार आरपीएफ को अब तक प्राप्त नहीं हुए हैं। मध्य और पश्चिम रेलवे द्वारा सीसीटीवी कैमरे को लेकर दिए गए जानकारी पर सवाल उपस्थित रेलवे एक्टिविस्ट समीर  जवेरी ने बताया की रेलवे के पास इंजिनियर,इलेक्ट्रीसियन सभी विभाग उनके पास है अगर रेलवे खुद कैमरा लगाती है इस से सस्ता रहेगा इतना ही नही इनकी मोनिटरिंग भी सुरक्षित रहेगा | रेलवे यात्री प्रवीन त्रिपाठी ने बताया की रेलवे के लिए सीसीटीवी कैमरों की हमेशा जरुरत है इस के लिए किराये पर लेने की जरुरत ही नही है खुद का होना चाहिए | युवा सेना के दक्षिण मध्य मुंबई के अध्यक्ष एड धर्मेन्द्र मिश्रा ने हमारा महानगर को बताया की दिल्ली कॉमन वेल्थ गेम के दौरान कलमाड़ी ने खुद कैमरा खरीदकर उसे महंगे दर पर लगवाया था | कही उसी तरह से रेलवे में भी इस तरह से कोई अधिकारी उच्च दर पर अपने फायदे के लिए तो नही दिया है इस की जांच होनी चाहिए | भाजपा उत्तर भारतीय मोर्चा दक्षिण मध्य मुंबई के जिला अध्यक्ष ओमप्रकाश पाण्डेय ने हमारा महानगर को बताया की इस की जांच होने के साथ ही कैमरे की क्वालिटी की जांच होनी चाहिए क्यों स्टेशनों पर हुए कई इस तरह की घटना है जिसमे आरोपी का या घटना आज तक पहचान नही हो पाया इस के साथ ही उन्होंने बताया की अगर किसी मामले में आरोपियों की पहचान भी हुआ तो उसे सही से पहचान करने में काफी समय गवाने पड़े है | इस के लिए इस की क्वालिटी पर भी संदेह है |

३०५ करोड़ की निविदा में भारी अनियमितता

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३०५ करोड़ की निविदा में भारी अनियमितता
टाटाभेल जैसी कंपनी को किया अपात्र
एंटी करप्शन से करेंगे शिकायत
नागमणि पाण्डेय
मुंबई :नवी मुंबई महानगरपालिका द्वारा ३०५ करोड़ रूपए की लागत से मोरबे धरण के हद में २० मेगावाट सौर्य ऊर्जा और १.५ मेगावाट जल ऊर्जा की निर्मिति का निर्णय लिया गया है और इस सन्दर्भ में निविदा भी स्वीकृत हो चुकी है. निविदा प्राप्त करने वाली कंपनी को कार्यादेश भी प्रदान कर दिया गया है. मगर नवी मुंबई के आर टी आई कार्यकर्ता राजीव मोहन मिश्रा ने पालिका प्रशासन से सुचना के अधिकार के तहत जो दस्तावेज प्राप्त किया है उससे इस निविदा में भारी अनियमितता किये जाने के सबूत प्राप्त हुए हैं. इस निविदा में अनियमितता की शुरुवात निविदा शर्तों से ही कर दी गई है और इसको अंतिम रूप अपने पसंदीदा कंपनी को ठेका दिलाकर पूरा किया गया है. इस निविदा में जिस व्यापक पैमाने पर अनियमितता की गई है उससे पालिका की इ टेंडरिंग व्यवस्था पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा हो गया है.
नवी मुंबई महानगरपालिका के विधुत अभियांत्रिकी विभाग ने इस प्रकल्प के लिए जो निविदा शर्त तैयार की वह शर्त इतनी गलत थी कि टाटा और भेल (BHEL) जैसी कंपनियां इच्छुक होने के बाद भी इस निविदा को प्राप्त नहीं कर सकीं और लैपटेक सोलुशन जैसी कंपनी को यह निविदा हासिल हो गई जो कम्प्यूटर्स का पार्ट्स औरकंप्यूटर एसेसरीज बेचने का धंधा करती है. इस निविदा को भरने के लिए योग्यता की एक शर्त ऐसी थी जिसमे मुख्य निविदाधारक का ३ अन्य प्रकार की कंपनियों से समन्वय होना जरुरी था. जिन कंपनियों से समन्वय किया जाना जरुरी था उसमे एक का सोलर पैनल का निर्माता होना जरुरी था , दूसरे का हाइड्रो पावर प्लांट निर्माता होना जरुरी था और तीसरे का एनर्जी ट्रेडिंग में होना जरुरी था. निविदा की इस शर्त को लेकर टाटा और भेल (BHEL) जैसी कंपनियों ने आपत्ति दर्ज कराई थी और इसे हटाने की मांग की थी, मगर नवी मुंबई महानगरपालिका के अधिकारियों ने इस शर्त को हटाने से इंकार कर दिया। इस प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए सिर्फ ६ महीने का समय सिमा दिया गया जिसपर टाटा और भेल (BHEL) जैसी कंपनियों का यह कहना था कि इतने कम समय में इस प्रोजेक्ट को पूरा कर पाना संभव नहीं है इसलिए समय सिमा कम से कम एक साल की जानी चाहिए, मगर पालिका प्रशासन ने इसे भी मानने से इंकार कर दिया। इस निविदा की एक शर्त यह भी थी कि प्रोजेक्ट से सम्बंधित सारी सरकारी स्वीकृति ठेका प्राप्त करनेवाली कंपनी को लानी होगी, पालिका के इस शर्त पर भी टाटा और भेल (BHEL) जैसी कंपनियों ने अपना एतराज दर्ज कराया था.
टाटा ने पालिका को यह बताने का भी प्रयास किया था मोरबे धरण सौर्य ऊर्जा के निर्मिति प्रकल्प के लिए सही जगह नहीं है, इसलिए इसके लिए किसी अन्य विकल्प जगह का चयन किया जाए मगर पालिका के विधुत विभाग ने टाटा के इस सुझाव को भी मानने से इंकार कर दिया।
पालिका के विधुत विभाग के इन शर्तों के कारण टाटा और भेल (BHEL) के समान अन्य कई बड़ी कंपनियां भी इस निविदा को भर पाने में असफल रहीं और विधुत विभाग के जो कुछ चहेते ठेकेदार थे वही इस निविदा को भर पाने में सफल रहे. निविदा भरने वाली सभी कंपनियां पुणे के औंध से हैं और यह सभी कंपनियां कंप्यूटर क्षेत्र में कार्यरत हैं. जिस लैप्टेक सोलुशन कंपनी को यह निविदा हासिल हुई है उसके कार्य पूरा करने की समय सिमा १०/०५/२०१५ को समाप्त हो रही है, मगर उसकी तरफ से अभी तक कार्य का भूमिपूजन तक नहीं किया गया है. ऐसे में सवाल यह उठता है कि पालिका ने अपनी निविदा में ऐसी विशेष शर्तों का निर्माण कैसे किया जिससे किसी विशेष कंपनी को फायदा हो सके जबकि ऐसी विशेष शर्तों पर केंद्रीय सतर्कता आयोग ने सख्ती से पाबन्दी लगा रखी है?
लैप्टेक सोलुशन कंपनी द्वारा प्रोजेक्ट निर्मिति, प्रोजेक्ट मेंटेनेंस के खर्च और ऊर्जा उत्पादन को लेकर जो आंकड़े पालिका प्रशासन को दिए गए हैं वह भी काफी संदिग्ध है. ज्ञात हो कि पहले इस निविदा को हासिल करने में निर्मल डॉटाकॉम नामक कंपनी सफल हुई थी और उस वक़्त लैप्टेक सोलुशन दूसरे नंबर पर थी. उस समय लैप्टेक कंपनी ने सौर्य ऊर्जा निर्मिति प्रकल्प का २५ साल तक रख रखाव का खर्च ८५ करोड़ रूपए बताया था जो इसबार बढ़कर १२५ करोड़ रूपए हो गया है. ऊर्जा उत्पादन का आंकड़ा उस वक़्त ६६ करोड़ यूनिट बताया गया था जो इसबार घटकर ५८ करोड़ हो गया है. इससे पालिका को १०० करोड़ से ज्यादा का नुकसान होना है.
इन सभी दस्तावेजों का संकलन पत्रकारों के सामने पेश करनेवाले आर टी आई एक्टिविस्ट राजीव मिश्रा ने पिछले ८ महीने में ३ बार इसकी लिखित शिकायत तत्कालीन पालिका आयुकत और वर्त्तमान पालिका आयुक्त से की है. मिश्रा का कहना है कि निविदा के दस्तावेज एक बड़े भ्रष्टाचार का संकेत दे रहे हैं और इसकी गंभीरता से जांच होनी जरुरी है, क्योंकि यह दस्तावेज यह भी इशारा कर रहे हैं कि पालिका में इ टेंडरिंग की व्यवस्था के बावजूद पालिका के अधिकारी अपने मनपसंद ठेकेदारों को निविदा दिलाने में सफल हो रहे हैं और पालिका में ठेकेदारों का रिंग जारी है.