Month: October 2018

एफडीए ने भेजा 113 आॅनलाइन कंपनियों को स्टॉप वर्क नोटिस

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एफडीए ने भेजा 113 आॅनलाइन कंपनियों को स्टॉप वर्क नोटिस

350 जगहों पर की गई छापेमारी, फर्श पर बने किचन में तैयार हो रहे खाद्य पदार्थ

  • > गंदगी में बने खाने के कारण लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है बुरा असर
मुंबई। आॅनलाइन खाना आॅर्डर करने वाली कंपनियों के 350 जगहों पर महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) ने छापेमारी की। जिसमें से 113 जगहों पर फर्श पर बने किचन पर खाद्य पदार्थ तैयार करते पाया गया। इतना ही नहीं इन किचन में गंदगी के बीच खाद्य पदार्थ बनाए जाने के साथ ही सफाई नहीं होने के कारण नागरिकों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। जिसके बाद 113 कंपनियों को एफडीए ने स्टॉप वर्क नोटिस भेजा है।
> डिजिटल इंडिया का जमाना है, जिसमें आज खाने की चीजें भी आॅनलाइन हो चुकी है। एक बटन क्लिक करते ही आपका मनपसंद खाना आपके घर तक पहुंचा दिया जाता है, लेकिन आपने कभी सोचा कि जो आप खाना खा रहे हैं वो कितना शुद्ध है? आॅनलाइन खाना बेचने वाली कंपनियों पर भरोसा कर खाना आॅर्डर करते हंै। क्या आपको पता है कि, जोमैटो, स्विगी, फूडपंडा और उबर इट्स जैसे एग्रीगेटर्स की वेबसाइट से जो खाना आॅर्डर करते हंै वो कैसे बनाया जाता है? आपको भेजा गया भोजन एक स्वच्छ रसोई घर में तैयार किया गया है या फर्श पर बने किचन में, यह बात पता नहीं चलती है।
> कुछ ऐसी जानकारी महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) को मिली, जिसके बाद विभाग के अधिकारियों द्वारा आॅनलाइन फूड बेचने वाली कंपनी जैसे जोमैटो, स्विगी, उबर इट्स और फूडपांडा अन्य ऐसी कंपनियों में 349 जगह पर छापेमारी की गई। इस कार्रवाई में पता चला कि इन कंपनियों के किचन में काफी गंदगी व घटिया खाद्य सामग्री का उपयोग किया जाता है। हालांकि मुंबई फूड एंड ड्रग्स विभाग ने ऐसी 113 कंपनियों को स्टॉप वर्क का नोटिस जारी किया है। 85 कंपनियां जिसमें (स्विगी -50), (जोमैटो-3) (फूडपांडा-2), उबर इट्स के अलावा अन्य कई कंपनियां शामिल हैं।

100 से अधिक भोजनालय के पास लाइसेंस नहीं

> महाराष्ट्र एफडीए के एक अधिकारी ने कहा कि पूरी तरह से निरीक्षण के बाद खुलासा हआ है कि इन शीर्ष ब्रांडों में से कम से कम एक के साथ काम करने वाले करीब 100 से भी अधिक भोजनालयों के पास लाइसेंस भी नहीं है। इसका मतलब यह कि जमीन पर भोजन तैयार कर लोगों तक पहुंचाया जाता है। एफडीए द्वारा रखे गए किसी भी स्वच्छता नियमों का पालन करने के लिए बाध्य नहीं है।
> अधिकारी ने कहा कि इन छोटे और मध्यम स्तर के रेस्तरां में परोसा जाने वाला भोजन की गुणवत्ता बिना जांचे ग्राहकों के दरवाजे तक पहुंचाया जाता है। इसलिए अगली बार आॅनलाइन भोजन आॅर्डर करने से पहले उसकी जांच कर लें।
फूड एप्लीकेशन आने की वजह से बड़े पैमाने पर फूड डिलीवरी की जाती है, हमारा इस पर ध्यान काफी दिनों से था, कि जहां आॅर्डर किया जाता है वह कितना शुद्ध है। एफडीए ने मुंबई के 350 जगहों पर छापेमारी की । छापेमारी में पता चला कि 100 से भी अधिक जगहों पर खाना बनाने का लाइसेंस तक नहीं था। वहां खाना बनाने में गंदगी व घटिया खाद्य सामग्री का उपयोग किया जाता है। उन्हें स्टॉप नोटिस देकर बंद किया गया है। इसमें जोमैटो, स्विगी, उबर इट्स और फूडपांडा जैसी अन्य कई कंपनियों को कारण बताओ नोटिस भेजा गया है। कंपनियों को एफडीए के लाइसेंस के नियमों का पालन करना होगा। आने वाले दिनों में पूरे राज्य में भोजनालयों के निरीक्षण का संचालन किया जाएगा और खाद्य सुरक्षा मानकों के उल्लंघन में पाए गए किसी भी रेस्तरां को बंद कर दिया जाएगा।
-पल्लवी दराडे, आयुक्त,
महाराष्ट्र फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन
आॅनलाइन फूड डिलीवरी करने वाली कंपनियांसस्ते दर और कम समय में ग्राहकों को उनके जरुरत अनुसार पदार्थ पहुंचाने के लिए जगह-जगह पर छोटे छोटे होटलों से टाइअप करती हैं। वहां सब खाद्य पदार्थ कैसे बनता है? इस पर कोई ध्यान नहीं देता है। इन पदार्तों को खाने के कारण नागरिकों के स्वास्थ्य को खतरा बना रहता है, इसके लिए एफडीए को विशेष ध्यान देने की जरुरत है।
-मोहम्मद हुसैन खान , प्रदेश सचिव, भाजपा अल्पसंख्यक महाराष्ट्र
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जीपीएस वॉच करेगी वाच 

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जीपीएस वॉच करेगी वाच

NMMC बांटेगी 11 करोड़ की घड़ी

> नागपुर में शुरू जीपीएस मॉनिटरिंग की नकल

> महासभा और स्थायी समिति को बताए बिना प्रशासन ने लाया प्रस्ताव

मुंबई। नवी मुंबई महानगरपालिका में तकनीक के नाम पर होनेवाला भ्रष्टाचार अब अपने चरम पर पहुंच चुका है। पालिका में नए कर्मचारियों की नियुक्ति को लेकर अपनी आर्थिक बजट का रोना रोनेवाली नवी मुंबई महानगरपालिका नई-नई तकनीकों के नाम पर प्रतिवर्ष सैकड़ों करोड़ रुपए लुटाने का कार्य कर रही है। पहले कर्मचारियों की उपस्थिति को जांचने के लिए बॉयोमेट्रिक प्रणाली के नाम पर करोड़ों रुपये की निविदा मंजूर की गई। अब एक ऐसी घड़ी को किराए पर लेने की निविदा निकाली गई है, जो जीपीएस सिस्टम से जुड़ी होगी और इसके जरिए कौन कर्मचारी कहां मौजूद है, इस पर निगरानी रखी जा सकेगी। पालिका प्रशासन इस घड़ी के लिए 42 महीने में 11 करोड़ रुपए का भुगतान किराए के रूप में घड़ी आपूर्ति करनेवाली कंपनी को करनेवाला है।
शहर के सौंदर्यीकरण के नाम तरह-तरह के फाउंटेन लगाने की बात हो या फिर मलनि:सारण के शुद्धिकरण प्लांट की बात हो, कचरे के वैज्ञानिक पद्धति से वर्गीकरण की बात हो या मशीन से सड़क की सफाई का मुद्दा हो, बिजली बचाने वाले बल्ब की बात हो या पानी की गणना करनेवाले यंत्र की बात, इलेक्ट्रिक से चलनेवाली बस की बात हो या अस्पतालों और स्कूलों के यांत्रिक साफ-सफाई की बात, सब जगह नई-नई तकनीक को सामने रखकर जमकर सरकारी तिजोरी को खाली करने का कार्य किया जा रहा है। अब कर्मचारियों की उपस्थिति और उनके द्वारा किए जानेवाले कार्यों की निगरानी के नाम पर भी करोड़ों रुपए प्रतिवर्ष लुटाने का प्रयास किया जा रहा है।
पालिका आयुक्त पर भी तकनीक के आकर्षण का गहरा प्रभाव
> पालिका प्रशासन के इस निर्णय को कई सामाजिक कार्यकर्ता तकनीक के नाम पर पैसे की बर्बादी बता रहे हैं। उनके अनुसार पालिका प्रशासन ने इससे पहले भी तकनीक के नाम पर कई नई परियोजनाओं को अमल में लाने का प्रयास किया है, जो कुछ ही दिनों में टांय-टांय फिस्स हो गई है। उदाहरण के तौर पर पालिका ने अपने सभी प्रमुख कार्यालयों, सभी सफाई कामगारों की स्टील चौकियों और मुख्यालय में बॉयोमेट्रिक हाजिरी की व्यवस्था की, मगर यह व्यवस्था कुछ ही दिनों में टांय-टांय फिस्स हो गई। इसके बाद नवी मुंबई महानगरपालिका परिवहन की सभी बसों में जीपीएस प्रणाली बिठाई गई, मगर यह प्रणाली भी कुछ ही दिनों में टांय-टांय फिस्स हो गई।
> नवी मुंबई के सभी तालाबों और कई उद्यानों में आकर्षक फाउंटेन और आकर्षक रोशनाई लगाने का कार्य किया गया, मगर इस व्यवस्था ने भी कुछ ही दिनों में दम तोड़ दिया। सड़कों की सफाई मशीन और यांत्रिक साफ-सफाई के नाम पर पालिका में कितने बड़े पैमाने पर घोटालों को अंजाम दिया गया है, यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसे अनेक उदाहरणों का हवाला देते हुए सामाजिक कार्यकर्ता राजीव मिश्रा ने कहा कि पालिका आयुक्त रामास्वामी जैसे समझदार व्यक्ति के होते हुए भी अगर इस तरह के निविदाओं को बिना पहले की पृष्ठभूमि जाने मंजूरी दी जाती है, तो इसका मतलब है कि वर्तमान पालिका आयुक्त पर भी तकनीक के आकर्षण का गहरा प्रभाव है।
जीपीएस घड़ी की मदद से सफाई कर्मचारियों की मॉनिटरिंग करने का प्रोजेक्ट नागपुर में शुरू किया गया है, इसलिए नवी मुंबई मनपा में भी शुरू करने का प्रस्ताव मनपा प्रशासन ने लाया है। इस प्रस्ताव के बारे में महासभा या स्थायी समिति को कोई भी जानकारी नहीं दी गई है। नागपुर में यह प्रोजेक्ट सफल हुआ है या फेल हुआ है, इसकी कोई जानकारी नहीं है। इसके साथ ही मॉनिटरिंग करने के लिए एक अलग से सर्वर रूम रखना पड़ेगा। वहां से कर्मचारी के माध्यम से इस पर नजर रखी जाएगी। इस बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं दी गई है। एक तरह से मनपा प्रशासन द्वारा जबरन यह प्रस्ताव लाया गया है।
– विश्वरथ नायर , विश्लेषक, नवी मुंबई मनपा
नवी मुंबई मनपा के पूर्व पालिका आयुक्त स्व. भास्कर वानखेड़े ने अपने कार्यकाल के दौरान एक महत्वपूर्ण आदेश जारी किया था जिसमें 5 करोड़ से ज्यादा की किसी भी निविदा को मंजूरी देने से पहले एक विशेष तकनीकी समिति के जरिए उस निविदा को स्वीकृत किया जाना आवश्यक था। इस निविदा से जुड़े कार्य के पिछले 5 वर्ष के इतिहास को सामने रखना जरूरी था, मगर भास्कर वानखेड़े के पद से हटते ही उनके इस लिखित आदेश को भी दफना दिया गया।
– राजीव मिश्रा, सामाजिक कार्यकर्ता

हत्या का मामला दर्ज कराने की याचिका दाखिल

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हत्या का मामला दर्ज कराने की याचिका दाखिल

नालासोपारा राणा एनकाउंटर: फर्जी एनकाउंटर की पुनरावृत्ति!

> दो पुलिस सिपाहियों को बचाने के लिए दिया एनकाउंटर का रूप

> हत्या का मामला दर्ज कराने की अपील

> मामले की सीबीआई जांच की मांग

मुंबई। महाराष्ट्र में लखन भैया फर्जी एनकाउंटर के बाद फिर पुलिस पर फर्जी एनकाउंटर के गंभीर आरोप लग रहे हैं। इस बार मामला नालासोपारा पुलिस स्टेशन की हद का है। 23 जुलाई 2018 को नालासोपारा अपराध शाखा के अंतर्गत कार्यरत 2 सिपाहियों ने जोगेंद्र गोपाल राणा उर्फ गोविंद को मौत के घाट उतार दिया था। इस मामले को जिस तरीके से एनकाउंटर का रूप दिया गया, उससे नालासोपारा पुलिस पूरी तरह विवाद में घिर गई है। एनकाउंटर में शामिल पुलिसकर्मियों पर हत्या का मुकदमा दर्ज करने के लिए मृतक के भाई ने मुंबई उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। उसका आरोप है कि इस एनकाउंटर में स्थानीय पुलिस अधीक्षक और नालासोपारा अपराध शाखा के वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक की भूमिका भी काफी संदिग्ध है, इसलिए इनके ऊपर भी हत्यारों को बचाने के लिए आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए।

> मृतक जोगेंद्र के भाई सुरेंद्र की मानें तो 23 जुलाई 2018 को शाम 4 बजे उन्हें जोगेंद्र के एनकाउंटर की खबर फोन पर मिली। इसके बाद वह अपने मृत भाई को देखने अस्पताल पहुंचे। अपने भाई की मौत पर उन्हें संदेह हुआ और उन्होंने इस एनकाउंटर से संबंधित जितने भी फोटोग्राफ्स और वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किए गए थे, उसको इकट्ठा करना शुरू किया और स्वयं भी घटनास्थल पर पहुंचकर छानबीन शुरू कर दी।

> इस दौरान उनकी मुलाकात उस सचिन नामक व्यक्ति से हुई जो एनकाउंटर के वक्त मृतक जोगेंद्र के साथ था। उस समय दोनों एक साथ वड़ा-पाव खा रहे थे। सचिन के अनुसार पुलिसवालों ने जोगेंद्र से उसके द्वारा किए गए एक पुराने अपराध का हवाला देकर पैसे की मांग की और पैसे न देने पर गिरफ्तार करने की धमकी भी देने लगे। दोनों पुलिसवाले सादी वर्दी में थे और उनके पास पिस्टल भी थे। इससे घबराकर जोगेंद्र ने भागने की कोशिश की, तो एक पुलिसवाले ने पहले उसके पैर में गोली मार दी। जब जोगेंद्र गिर पड़ा तो फिर उसके नजदीक जाकर उन्होंने उसके सीने में भी गोली मारी, जिससे उसकी मृत्यु हो गई।

हत्या के बाद एंबुलेंस के बजाय आॅटो में ले गए शव

एनकाउंटर करने के बाद दोनों पुलिसकर्मी, जिनमें से एक का नाम मनोज सकपाल और दूसरे का नाम मंगेश चव्हाण है। उन्होंने एक आॅटो को बुलाया और उसमें जोगेंद्र की लाश को लादकर उसे अस्पताल पहुंचा दिया। इन्हीं सब घटनाओं को आधार बनाकर मृतक के भाई ने मुंबई उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है। हद तो तब हो गई, जब इस एनकाउंटर को सही ठहराने के लिए पुलिस ने एक सफेद झूठ का सहारा लिया और यह बताया कि जोगेंद्र ने पहले पुलिसवालों पर चाकू से हमला कर उन्हें घायल कर दिया और पुलिसवालों ने अपनी आत्मरक्षा में उसे शूट कर दिया। कहानी को बल देने के लिए पुलिसवालों ने एक चाकू भी मृतक के शव के बगल में रख दिया था।

पुलिसवालों पर चाकू से हमला करने का दावा फर्जी

मृतक राणा के भाई ने बताया कि पुलिसवालों का यह झूठ तब बेनकाब हो गया, जब एनकाउंटर के बाद के फोटो सोशल मीडिया पर अपलोड हो गए। इसमें मृतक से थोड़ी दूरी पर जो चाकू गिरा हुआ दिखाया गया है, उसमें खून की एक बूंद भी दिखाई नहीं दे रही। जिन पुलिसवालों को चाकू से घायल होने की बात की जा रही है, वह दोनों पुलिसवाले एनकाउंटर के बाद आसानी से टहलते और फोन पर बातचीत करते दिखाई दे रहे हैं। इन्हीं मजबूत तथ्यों को आधार बनाकर मृतक जोगेंद्र के भाई ने मुंबई उच्च न्यायालय में अपील दाखिल कर दोषी पुलिसवालों के खिलाफ हत्या और हत्या से जुड़े सबूतों को नष्ट करने के खिलाफ मुकदमा दाखिल करने की मांग की है। इसके साथ ही इसकी जांच सीबीआई से कराए जाने का निवेदन भी किया है। उच्च न्यायालय में इस याचिका पर 17 अक्टूबर को सुनवाई होनी है।
जोगेंद्र गोपाल राणा उर्फ गोविंद के खिलाफ पालघर जिले के अंतर्गत कहीं भी कोई मामला दर्ज नहीं है। कुछ मामले हैं भी, वो भी पालघर जिले के बाहर के, तो उसमें से कई मामलों में वह बाहर हो चुका था। इसके बावजूद फर्जी एनकांउटर के माध्यम से हत्या को अंजाम दिया गया। इस एनकाउंटर के फर्जी होने के पर्याप्त सबूत अपीलकर्ता के पास मौजूद हैं। कुछ जगहों के सीसीटीवी फुटेज, जो पुलिसवालों के दबाव में अपीलकर्ता को नहीं दिए जा रहे हैं, उन्हें उपलब्ध कराए जाने की मांग भी मुंबई उच्च न्यायालय से की गई है।

-एड. दत्ता माने, याचिकाकर्ता के वकील

मुंबई उच्च न्यायालय के आदेश के बाद नवी मुंबई में अवैध निर्माण के खिलाफ 500 से ज्यादा मामले दर्ज 

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मुंबई उच्च न्यायालय के आदेश के बाद नवी मुंबई में अवैध निर्माण के खिलाफ 500 से ज्यादा मामले दर्ज

  • मुंबई उच्च न्यायालय के आदेश को अमल में लाने का प्रयास

  • भूमाफियाओं में मची हड़कंप

मुंबई। नवी मुंबई में अवैध इमारतों का निर्माण करनेवाले भु माफिया और पालिका के विकास नियमावली के साथ खिलवाड़ करनेवाले सम्पन्न और प्रभावशाली लोगों पर मुम्बई उच्च न्यायालय के आदेश के बाद शिकंजा कसना शुरू हो गया है। नवी मुंबई महानगरपालिका के 8 विभाग कार्यालयों की आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2016 से जुलाई 2018 तक 550 से ज्यादा लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज किए गए हैं।

इसका खुलासा आरटीआई कार्यकर्ता राजीव मोहन मिश्रा द्वारा मांगी गई जानकारी में हुआ है। इसमें से सबसे ज्यादा एफ आई आर वाशी विभाग कार्यालय की तरफ से दर्ज किया गया है जिसकी संख्या 123 है। जबकि अवैध निर्माण कार्य क्षेत्र में नवी मुंबई का सबसे बदनाम क्षेत्र दिघा में जनवरी 2016 से लेकर जुलाई 2018 के बीच एक भी अवैध निर्माण कार्य के खिलाफ एफ आई आर दर्ज नही किया गया है।

बड़े भूमाफियाओं के बजाए सामान्य लोगों को बनाए ज्यादा निशाना

गौरतलब हो की नवी मुंबई में अवैध इमारतों का मुद्दा इतना ज्यादा गर्म हुआ कि इसका असर पूरे राज्य में दिखाई दिया और राज्य सरकार को अवैध इमारतों को नियमित किये जाने संबंधी कानूनी संशोधन के लिए मजबूर होना पड़ा। नवी मुंबई में अकेले दिघा क्षेत्र में 100 से ज्यादा अवैध बहुमंजिली इमारतों के निर्माण का खुलासा सूचना के अधिकार के अंतर्गत हुआ था।
इसके बाद यह मामला जनहित याचिका के माध्यम से मुम्बई उच्च न्यायालय की दहलीज पर जा पहुंचा। मुम्बई उच्च न्यायालय के सख्त आदेश से बचने के लिए राज्य सरकार ने अवैध निर्माण को अधिकृत करने संबंधी नीति को मंजूरी दी। जिसे उच्च न्यायालय ने दो बार निरस्त कर दिया। इससे मजबुर होकर राज्य सरकार ने एमआरटीपी कानून में ही संशोधन कर डाला और 31 दिसंबर 2015 तक के सभी अवैध निर्माण कार्य को अधिकृत करने का मार्ग खोल दिया। मगर कानून में किये गए इस परिवर्तन को असंवैधानिक बताते हुए याचिकाकर्ता राजीव मिश्रा ने इसे मुम्बई उच्च न्यायालय में चुनौती दी। जिसपर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने फैसला सुरक्षित रखा है।
मगर न्यायालय की मार कहीं पालिका और सिडको के अधिकारियों पर न पड़े। इससे बचने के लिए इन दोनों ही संस्थाओं ने उपाय खोजना शुरू कर दिया है। पालिका प्रशासन इस मामले में सिडको और एमआईडीसी जैसी संस्थाओं से काफी आगे दिखाई दे रहा है और पालिका के 8 विभाग कार्यालय के अंतर्गत 550 से ज्यादा लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया गया है।

भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप

ऐरोली विभाग कार्यालय और कोपरखैरने विभाग कार्यालय के अंतर्गत बड़े भु माफियाओं के बजाए उन सामान्य लोगों को ज्यादा निशाना बनाया गया है, जिन्होंने अपने अधिकृत मकान या रॉ हाउस में छोटे मोटे अवैध निर्माण कार्य को अंजाम दिया है। यही कारण है कि ऐरोली और कोपरखैरने के अतिक्रमण अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे हैं।
नवी मुंबई मनपा के विभिन विभाग में दर्ज मामले
विभाग कार्यालय दर्ज मामले
वाशी 123
नेरुल 112
घनसोली 110
तुर्भे 82
ऐरोली 58
बेलापुर 45
कोपरखैरने 36
पालिका का यह कदम सराहनीय है। मगर पिछले 3 वर्ष में दिघा विभाग कार्यालय द्वारा एक भी एफ आई आर दर्ज न कराए जाने पर शंका है। पालिका को सामान्य नागरिको को परेशान करने के बजाय उन बड़े भू माफियाओ के खिलाफ सख्त कदम उठाना चाहिए।
– राजीव मिश्रा, याचिकाकर्ता

संभाजी भिडे और उसके साथियों पर सरकार मेहरबान

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संभाजी भिडे और उसके साथियों पर सरकार मेहरबान

> एक वर्ष में 41 केस सरकार के निर्देश पर लिए वापस

> भाजपा और शिवसेना के नेताओं और सैकड़ों कार्यकर्ताओं के दर्जनों केस वापस

> अब तक 6 दंगों के केस वापस

मुंबई। देश में जनता शांतिपूर्वक एवं भयमुक्त रहे इसके लिए देश में कई सख्त कानून बनाए गए हंै। मगर जब सरकार ही अपने वोट बैंक की राजनीति के चक्कर में संभाजी भिड़े जैसे हजारों राजनेताओं और कार्यकर्ताओं जो दंगा जैसे संगीन अपराध को वापस लेने का निर्णय लेती है, तो देश में कानून व्यवस्था कैसे कायम रहेगा। फौजदारी प्रक्रिया दंड संहिता की धारा 321 प्रावधानों के तहत राज्य सरकार को अधिकार है कि, मामूली किस्म के अपराध में केस वापस ले सकती है। 7 जून 2017 से 14 सितंबर 2018 तक फडणवीस सरकार संभाजी भिडे और उसके साथियों सहित सैकड़ों राजनेताओं पर दंगा जैसे गंभीर अपराधों को वापस लेने का निर्णय लिया है ऐसी जानकारी आरटीआई कार्यकर्ता एवं अधिकार फाउंडेशन के अध्यक्ष शकील अहमद शेख को गृह विभाग की सूचना अधिकारी तथा कक्ष अधिकारी प्रज्ञा घाटे ने दी है ।
  • > आरटीआई कार्यकर्ता शकील अहमद शेख ने गृह विभाग से मांग किया कि 2008 से अब तक कुल कितने राजनेताओं अथवा कार्यकर्ताओं के केस वापस लिया है। कितने सामान्य लोगों का केस वापस लिया है।
  • > इस सन्दर्भ में गृह विभाग की सूचना अधिकारी तथा कक्ष अधिकारी प्रज्ञा घाटे ने शकील अहमद शेख को जानकारी उपलब्ध कराईं है। प्राप्त जानकारी के अनुसार जून 2017 में संभाजी भिड़े और उनके साथियों के खिलाफ 3 केस वापस लिया है।

2017 से 14 सितंबर 2018 तक 41 केस लिए वापस

> 2008 से 2014 तक कांग्रेस और एनसीपी की आघाडी सरकार ने कोई भी केस वापस नहीं लिया है। वही 2014 में भाजपा की सरकार आने के बाद जून 2017 से 14 सितंबर 2018 तक 8 शासन निर्णय जारी करके कुल 41 केसों में हजारों आरोपियों का केस वापस लिया है। ज्यादातर फडणवीस सरकार ने भाजपा और शिवसेना के विधायक और कार्यकर्ताओं या समर्थक के खिलाफ केस वापस लिया है।
कुछ दिन पहले ही मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस कोरेगांव केस में आरोपी संभाजी भिड़े को क्लीन चिट दे चुके हैं।
> गौरतलब हो कि फडणवीस सरकार ने जितने भी 41 केसों को वापस लिया है। सबके सब दंगा फैलाना, सरकारी सम्पति को नुकसान पहुंचाना, सरकारी काम में बाधा डालना, और सरकारी कर्मचारी पर हमला करना जैसे संगीन अपराध दर्ज थे।

केस वापस लिए गए नेताओं की सूची

नाम पद व दल केस संख्या
राजू शेट्टी और अन्य सांसद, शेतकरी पक्ष 9/2015
संजय घाटगे पूर्व भाजपा तथा शिवसेना नेता 138/2006
नीलम गोºहे विधायक, शिवसेना 512/2010
मिलिंद नार्वेकर उद्धव ठाकरे के पीए, शिवसेना 512/2010
संजय (बाला) भेडगे भाजपा नेता 133/2011
प्रशांत ठाकुर विधायक भाजपा 03/2016
विकास मठकरी भाजपा 268/2010
अनिल राठोड नेता शिवसेना 198/2011
अभय छाजेड नेता कांग्रेस 33/2015
अजय चौधरी विधायक, शिवसेना 58/2005
डॉ. दिलीप येलगावकर विधायक,भाजपा 66/2013
आशीष देशमुख विधायक, भाजपा 14/2017
किरन पावसकर एमएलसी, एनसीपी 41/2016
सामान्य लोगों के वापस लिए गए केस
नाम जिला केस नंबर
अजय यादव व अन्य अमरावती 3041 / 15
संभाजी भिड़े सांगली 32/08,38 /08
हनुमंत पवार व अन्य सांगली 35 / 08
सागर गोविंदप्रकाश शर्मा मुंबई 05/14
सुधीर पाठक व अन्य नागपुर शहर 389 / 1999
दिलीप विट्ठल मोहिते व अन्य पुणे शहर 138 / 2005
विजय बापू मोहिते पुणे 40/2006
कनक मोहनलाल परमार मुंबई 101/15
चनप्पा रामचंद्र होर्तिकर सांगली 51 / 12
प्रफुल अग्रवाल व अन्य गोंदिया 97/2016
कुशेंद्र शिंदे रायगड 04/ 2016
मनीषा गुलाबराव पाटिल धुले 61/2009
बालाजी हरिदास जाधव सातारा 46/2013
मतीन भोसले व अन्य अमरावती 223/2013
मच्छिंद्र पा धुमाल व अन्य अहमदनगर 80 /2010
दीपक रामटेक व अन्य गडचिरौली 24 /2013
मनोहर गणपति उंडगे व अन्य कोल्हापुर 100 / 2012
मधुकर पाटिल व अन्य कोल्हापुर 60/2008
आदमसाब अब्दुल,रहिमान मंगावकर कोल्हापुर 54/ 2008
शाम म्हात्रे व अन्य रायगड 22 / 2014
अविनाश म्हात्रे व अन्य रायगड 23/2014
मधुसुदन दादुजी पाटिल व अन्य पुणे ग्रामीण 181/20 08
अर्जुन पंढरीनाथ जाधव व अन्य नाशिक शहर 125 / 2017
बबन गंगाधर कोलसे पाटिल व अन्य कोल्हापुर 92 / 2012
आप्पासाहेब कासिम पवार कोल्हापूर 19 / 2015
प्रवीण मोतीराम उमाटे व अन्य चंद्रपुर 211 / 2012
फडणवीस सरकार ने पिछले चार वर्षों में एक भी सामान्य जनता का केस वापस नहीं लिया है। बल्कि जितने भी केस वापस लिए हैं। ज्यादातर भाजपा और सेना के नेता या कार्यकर्ता तथा समर्थकों के विरुद्ध केस वापस लिया है। क्या राज्य सरकार सिर्फ नेताओं के लिए है। इस सन्दर्भ में मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस से मांग की है कि, वापस लिए गए केस निर्णय को तुरंत रद्द किया जाए।
– शकील अहमद शेख, आरटीआई कार्यकर्ता